Wednesday, July 22, 2020

एक और सुनो

इक ज़मीन,
कुछ फ़लों के पेड़,
कुछ क्यारियाँ, एक दो किलकारियाँ
कुछ कमरे, इक छत
पानी न ठहरने वाली फ़र्श
कुछ हाथ हमेशा साथ
एक मुस्कुराहट
क्या इतना महंगा था ये ख्वाब?


Friday, January 24, 2020

एक शेर लखनवी पर

ऐसा नहीं है सब लखनवी शायर ही होते हैं,
मिजाज़ बस ऐसा है जो शायराना लगता है |
मिलोगे उनको, तुम्हे लगेंगे बस अपने ही जैसे,
बस तल्लफ़ुज़ कुछ ऐसा है, याराना सा लगता है | 


एक और शेर

ज़िन्दगी उधार की नहीं है, जिसे जी रहा हूँ मैं
बस इधर उधर की बात है, जिसे पी रहा हूँ मैं

एक शेर लखनऊ पर

यूँ रह गयी है शहर-ए-अदब लखनऊ अब मेरी,
शहर-ए-सुखं छिपा है ताख़ पर, बस दबदबा चल रहा|

Friday, November 01, 2019

एक सुनो दिल्ली के धुएँ पर


किस कम्बख्त ने धुऐं को बुरा कहा?
दिल सुलगता है, फेफड़े जलते हैं, तब कहीं उठता है|
इन गाड़ियों खेतों पर मत जाना,
इंसानी फितरत है, चाह जीने की, पर खुद ही मिटता है|

Tuesday, October 22, 2019

सुनो

जो लिखा हुआ वो झूठ नहीं,
सच है, बस तुझे मंज़ूर नहीं
तुम हँसते हो मुझ पर लेकिन,
क्या भूल गए कुछ याद नहीं?
 

Wednesday, July 03, 2019

एक और सुनो

कमज़ोर होती आँखों में कुछ दुनिया की धूल है,
कुछ नैतिकता की चमक कुछ आँसू, कुछ भूल है
दिखाई दे न दे क्या आगे है मेरे,
मुझे मालूम है मगर पास क्या है मेरे, क्या दूर है