Thursday, October 27, 2016

Another response to Kumar Vishwas's tweet



My Response:
फूल खींच लेते हैं मेरी निगाहें अपनी तरफ,
ये तो चुभते काँटे जो हैं बताते किधर रस्ता है।

इक और सुनो

क्या माला क्या चादर, आँसू मेरी इबादत हैं - तू गिरने मैं सूखने नहीं देता।

Wednesday, October 19, 2016

एक और सुनो

शादी को जबसे सबूत-इ-इश्क़ माना,
चाँद ने भी रोज़े का सबूत माँगा!


Monday, October 03, 2016

मुलाहिज़ा है

डॉ फ़ैयाज़ वजीह ने लिखा -
फ़िदा-ए-मुल्क होना हासिल-ए-क़िस्मत समझते हैं,
वतन पर जान देने ही को हम जन्नत समझते हैं

मैंने बढ़ा दिया -
वतन पर वो नहीं जिसको किसी सरहद से बाँधा हो,
हम अपनी रहनुमाईँ को बेइन्तेहाँ समझते हैं।