Monday, December 12, 2016

एक और


चलता रहा सोच के पीछे है कोई खंजर लिए हुए,
मुड़ के देखा होता कम से कम धार तो उसकी।
डरता रहा ता-उम्र संभल के चलूँ ज़रा,
डूब रहा हूँ पैर के नीचे समन्दर लिए हुए।

Saturday, November 12, 2016

सुदामा का काला धन

रुको सुदामा थोड़ा सोचो, कैसे झोपड़ महल हुई?
कैसे आया सोना चांदी कैसे आँगन चहल हुई?
क्या बोलोगे कैसे आया कहाँ से आया किसने दी?
काले ने दी ये कह देना, नहीं चलेगी नहीं चलेगी।

Thursday, October 27, 2016

Another response to Kumar Vishwas's tweet



My Response:
फूल खींच लेते हैं मेरी निगाहें अपनी तरफ,
ये तो चुभते काँटे जो हैं बताते किधर रस्ता है।

इक और सुनो

क्या माला क्या चादर, आँसू मेरी इबादत हैं - तू गिरने मैं सूखने नहीं देता।

Wednesday, October 19, 2016

एक और सुनो

शादी को जबसे सबूत-इ-इश्क़ माना,
चाँद ने भी रोज़े का सबूत माँगा!


Monday, October 03, 2016

मुलाहिज़ा है

डॉ फ़ैयाज़ वजीह ने लिखा -
फ़िदा-ए-मुल्क होना हासिल-ए-क़िस्मत समझते हैं,
वतन पर जान देने ही को हम जन्नत समझते हैं

मैंने बढ़ा दिया -
वतन पर वो नहीं जिसको किसी सरहद से बाँधा हो,
हम अपनी रहनुमाईँ को बेइन्तेहाँ समझते हैं।

Sunday, September 04, 2016

फिर से एक

खुद पर ही शायद हँसता था, फिर भी हँसता रहता था।
बस अब इतना ग़म है यारों, हँसना पूरा भूल गया।
पीने की तो आदत ना थी, मुखमुर फिर भी साथ में थे।
मैख़ाना जब से छूटा है, जीना पूरा भूल गया।
हँसना पूरा भूल गया।


Tuesday, August 30, 2016

इक और सुनिये

इतना ग़ुम हूँ कुछ यादों में यादें याद नहीं रहतीं,
रोने के बाद भी देखो चीखें फरियाद नहीं बनतीं।
सुनाऊँ किसको मैं ये दर्द सभी आँसू में भीगे हैं,
हमारी चुप्पियाँ भी तो कोई बुनियाद नहीं बनतीं।


Friday, August 05, 2016

ऐसे ही एक और

ना कह के भी कुछ यूँ कह दिया,
जान कर भी वो गलत समझा ऐसा कहा।
बोल देते तो फिर कुछ क्या होता,
सुन कर भी जिसने अनसुना किया?


Saturday, June 25, 2016

इक और सुनो

मुलाहिज़ा फरमाइए -
मेरी ख़ामोशी को इंकार समझ बैठे,
इक बार तो आँखों में उतर कर देखा होता।


Tuesday, June 21, 2016

ये लखनऊ है जनाब

कुछ बदली बदली शाम थी,
नई दुकान पर पुरानी मकान थी,
पसीनो में कार पर साइकिल की शान थी,
बदले हुए चेहरों के बीच ये वही अवध-ए-शाम थी।

ऑटो में शायरी पर टांगों पे नवाब थे,
जूतों से ज्यादा बाटा के दुकान थे,
टुंडे कबाब के साथ रोटी भी रुमाल थे,
लखनऊ की शान में लोगों के जमाल थे।



Thursday, May 05, 2016

ऐसे ही

अरमानों की थाली पर कुछ स्वप्न सजाए जाते हैं,
कुछ पूरे कुछ आधे होते कुछ रुला रुला कर जाते हैं।
जीवन है - सीखे स्वप्नों से, उपलब्धि से और दण्डो से,
वो भारी भारी पल ही हैं जो जेबों में रह जाते हैं।
बस एक दो पल की हंसी में ही वर्षों के आंसू बह जाते हैं,
कुछ रुला रुला कर जाते हैं।

मैंने ये देखा वो देखा अपनों को बंधक देखा है,
अपने ही तलवारों से खुद को भी कटते देखा है,
क्या पाया क्या खोया है खुद समय में बंधते देखा है,
जर्जर होती कुछ काया को साड़ी में लिपटे देखा है,
क्या सोचूँ क्या कर्म करूँ क्या पढ़ूँ, और मैं क्या समझूँ?
वो अपनों से लगने वाले ही डस कर तुझको जाते हैं,
कुछ रुला रुला कर जाते हैं।




 

Monday, March 28, 2016

सुन लो

हमने छिपाए थे अपने ग़म, तुमने छिपाई थी अपनी ख़ुशी। 
फ़र्क़ इतना झूठ का - आँसुओं में धुली थी मेरी हंसी॥


Wednesday, March 16, 2016

इक और उत्तर

किसी ने लिखा है-
अंधेरे चीर के जुगनू निकालने का हुनर.. बहुत कठिन है मगर तू निकाल लेता है !

तो मेरा भी सुनें -
सुनो ऐ धूप में आँख जलाने वालों  -
इक अँधेरा ही है जो रौशनी छिपाने देता है। 


Wednesday, February 24, 2016

इक और सुनो

दिल का क्या है ये पगला किसी आँख से देखे है किसी कान से सुनता है,
हड्डियों में क़ैद है ऐसा मुझे क्यूँ लगता है?


Friday, February 05, 2016

एक बार फिर मेरा उत्तर

डॉ कुमार विश्वास ने लिखा: 
"उसी की तरह मुझे सारा ज़माना चाहे ,
वो मेरा होने से ज़्यादा मुझे पाना चाहे !
मेरी पलकों से फिसल जाता है चेहरा उसका ,
ये मुसाफ़िर तो कोई और ठिकाना चाहे !
एक बनफूल था इस शहर में वो भी न रहा ,
कोई अब किस के लिए लौट के आना चाहे !
हम अपने जिस्म से कुछ इस तरह हुए रुखसत ,
साँस को छोड़ दिया जिस तरफ़ जाना चाहे...!"


 तो मेरा जवाब भी सुनो:
सांस है केवल क़रीबी जानें,
जिस्म तो दूर से कहता है की हम ज़िंदा हैं।
भटके हैं तो अपनी मर्ज़ी से,
तेरे दिल के ही बाशिंदा हैं॥


Wednesday, February 03, 2016

अतिथि देवौ भवः

हिन्दू परंपरा में अतिथि को देव या ईश्वर कहा गया है। लेकिन अतिथि कौन है? अतिथि मेहमान नहीं है। अगर आप किसी समारोह के लिए अपने दोस्तों और परिवार के सदस्यों को आमंत्रण दें तो हम यह कहते ज़रूर हैं की ये मेरे अतिथि हैं लेकिन तिथि तो हमने पहले से ही तय कर दी तो वो अ-तिथि कैसे हो सकते हैं? 

अतिथि तो वो हुआ जो तिथि देख के ना आये, खुद ही आ जाए और जो खुद आ जाए वही तो ख़ुदा है।

Tuesday, February 02, 2016

Political perspective of India Australia Cricket series


: India lost the first four most important matches. T-20 is not cricket.
: @narendramodi inspired the last four wins.
: Its an Even win for Australia (4-1) and very Odd win for India (3-0)
: Advani ji ke leadership me hum 8 matches jeetate.
: Next time Australia ko Bihar mein khilayenge aur Tejaswi team ka captain hoga.
: Ye adha adha result Cricket state ke liye bahut kharab hai.
: Let me think.
: My BV was scared to watch the matches on TV.

Friday, January 22, 2016

सुन लो

My response to: https://t.co/nRtmxOC68t

चाँद तो पसंद है मुझे भी,
दीवारों ने रास्ता रोक  रक्खा है!


Wednesday, January 20, 2016

इक और सुन लो

सुबह की ज़रुरत पे सूरज उगा नहीं करता,
शाम के दौर से निकलो तो सवेरा मांगो!

A different perspective from my Sister:

सुबह की ज़रुरत पे सूरज उगा नहीं करता,
शाम के दौर से निकले तो सवेरा होगा!

Thursday, January 14, 2016

इक और सुनो

पतंग काटने मेरी जो छत पर चढ़े थे लोग,
हवा के रुख ने उन्हें उतरने पर मज़बूर किया।
ग़िला उन्हें हो या ना हो क्या जाता है?
सभी को उनके इरादों का पर सिला मिला॥