Friday, August 05, 2016

ऐसे ही एक और

ना कह के भी कुछ यूँ कह दिया,
जान कर भी वो गलत समझा ऐसा कहा।
बोल देते तो फिर कुछ क्या होता,
सुन कर भी जिसने अनसुना किया?


Saturday, June 25, 2016

इक और सुनो

मुलाहिज़ा फरमाइए -
मेरी ख़ामोशी को इंकार समझ बैठे,
इक बार तो आँखों में उतर कर देखा होता।


Tuesday, June 21, 2016

ये लखनऊ है जनाब

कुछ बदली बदली शाम थी,
नई दुकान पर पुरानी मकान थी,
पसीनो में कार पर साइकिल की शान थी,
बदले हुए चेहरों के बीच ये वही अवध-ए-शाम थी।

ऑटो में शायरी पर टांगों पे नवाब थे,
जूतों से ज्यादा बाटा के दुकान थे,
टुंडे कबाब के साथ रोटी भी रुमाल थे,
लखनऊ की शान में लोगों के जमाल थे।



Thursday, May 05, 2016

ऐसे ही

अरमानों की थाली पर कुछ स्वप्न सजाए जाते हैं,
कुछ पूरे कुछ आधे होते कुछ रुला रुला कर जाते हैं।
जीवन है - सीखे स्वप्नों से, उपलब्धि से और दण्डो से,
वो भारी भारी पल ही हैं जो जेबों में रह जाते हैं।
बस एक दो पल की हंसी में ही वर्षों के आंसू बह जाते हैं,
कुछ रुला रुला कर जाते हैं।

मैंने ये देखा वो देखा अपनों को बंधक देखा है,
अपने ही तलवारों से खुद को भी कटते देखा है,
क्या पाया क्या खोया है खुद समय में बंधते देखा है,
जर्जर होती कुछ काया को साड़ी में लिपटे देखा है,
क्या सोचूँ क्या कर्म करूँ क्या पढ़ूँ, और मैं क्या समझूँ?
वो अपनों से लगने वाले ही डस कर तुझको जाते हैं,
कुछ रुला रुला कर जाते हैं।




 

Monday, March 28, 2016

सुन लो

हमने छिपाए थे अपने ग़म, तुमने छिपाई थी अपनी ख़ुशी। 
फ़र्क़ इतना झूठ का - आँसुओं में धुली थी मेरी हंसी॥


Wednesday, March 16, 2016

इक और उत्तर

किसी ने लिखा है-
अंधेरे चीर के जुगनू निकालने का हुनर.. बहुत कठिन है मगर तू निकाल लेता है !

तो मेरा भी सुनें -
सुनो ऐ धूप में आँख जलाने वालों  -
इक अँधेरा ही है जो रौशनी छिपाने देता है। 


Wednesday, February 24, 2016

इक और सुनो

दिल का क्या है ये पगला किसी आँख से देखे है किसी कान से सुनता है,
हड्डियों में क़ैद है ऐसा मुझे क्यूँ लगता है?