Sunday, September 04, 2016

फिर से एक

खुद पर ही शायद हँसता था, फिर भी हँसता रहता था।
बस अब इतना ग़म है यारों, हँसना पूरा भूल गया।
पीने की तो आदत ना थी, मुखमुर फिर भी साथ में थे।
मैख़ाना जब से छूटा है, जीना पूरा भूल गया।
हँसना पूरा भूल गया।


Tuesday, August 30, 2016

इक और सुनिये

इतना ग़ुम हूँ कुछ यादों में यादें याद नहीं रहतीं,
रोने के बाद भी देखो चीखें फरियाद नहीं बनतीं।
सुनाऊँ किसको मैं ये दर्द सभी आँसू में भीगे हैं,
हमारी चुप्पियाँ भी तो कोई बुनियाद नहीं बनतीं।


Friday, August 05, 2016

ऐसे ही एक और

ना कह के भी कुछ यूँ कह दिया,
जान कर भी वो गलत समझा ऐसा कहा।
बोल देते तो फिर कुछ क्या होता,
सुन कर भी जिसने अनसुना किया?


Saturday, June 25, 2016

इक और सुनो

मुलाहिज़ा फरमाइए -
मेरी ख़ामोशी को इंकार समझ बैठे,
इक बार तो आँखों में उतर कर देखा होता।


Tuesday, June 21, 2016

ये लखनऊ है जनाब

कुछ बदली बदली शाम थी,
नई दुकान पर पुरानी मकान थी,
पसीनो में कार पर साइकिल की शान थी,
बदले हुए चेहरों के बीच ये वही अवध-ए-शाम थी।

ऑटो में शायरी पर टांगों पे नवाब थे,
जूतों से ज्यादा बाटा के दुकान थे,
टुंडे कबाब के साथ रोटी भी रुमाल थे,
लखनऊ की शान में लोगों के जमाल थे।



Thursday, May 05, 2016

ऐसे ही

अरमानों की थाली पर कुछ स्वप्न सजाए जाते हैं,
कुछ पूरे कुछ आधे होते कुछ रुला रुला कर जाते हैं।
जीवन है - सीखे स्वप्नों से, उपलब्धि से और दण्डो से,
वो भारी भारी पल ही हैं जो जेबों में रह जाते हैं।
बस एक दो पल की हंसी में ही वर्षों के आंसू बह जाते हैं,
कुछ रुला रुला कर जाते हैं।

मैंने ये देखा वो देखा अपनों को बंधक देखा है,
अपने ही तलवारों से खुद को भी कटते देखा है,
क्या पाया क्या खोया है खुद समय में बंधते देखा है,
जर्जर होती कुछ काया को साड़ी में लिपटे देखा है,
क्या सोचूँ क्या कर्म करूँ क्या पढ़ूँ, और मैं क्या समझूँ?
वो अपनों से लगने वाले ही डस कर तुझको जाते हैं,
कुछ रुला रुला कर जाते हैं।




 

Monday, March 28, 2016

सुन लो

हमने छिपाए थे अपने ग़म, तुमने छिपाई थी अपनी ख़ुशी। 
फ़र्क़ इतना झूठ का - आँसुओं में धुली थी मेरी हंसी॥