Saturday, November 12, 2016

सुदामा का काला धन

रुको सुदामा थोड़ा सोचो, कैसे झोपड़ महल हुई?
कैसे आया सोना चांदी कैसे आँगन चहल हुई?
क्या बोलोगे कैसे आया कहाँ से आया किसने दी?
काले ने दी ये कह देना, नहीं चलेगी नहीं चलेगी।

Thursday, October 27, 2016

इक और सुनो

क्या माला क्या चादर, आँसू मेरी इबादत हैं - तू गिरने मैं सूखने नहीं देता।

Wednesday, October 19, 2016

एक और सुनो

शादी को जबसे सबूत-इ-इश्क़ माना,
चाँद ने भी रोज़े का सबूत माँगा!


Monday, October 03, 2016

मुलाहिज़ा है

डॉ फ़ैयाज़ वजीह ने लिखा -
फ़िदा-ए-मुल्क होना हासिल-ए-क़िस्मत समझते हैं,
वतन पर जान देने ही को हम जन्नत समझते हैं

मैंने बढ़ा दिया -
वतन पर वो नहीं जिसको किसी सरहद से बाँधा हो,
हम अपनी रहनुमाईँ को बेइन्तेहाँ समझते हैं।

Sunday, September 04, 2016

फिर से एक

खुद पर ही शायद हँसता था, फिर भी हँसता रहता था।
बस अब इतना ग़म है यारों, हँसना पूरा भूल गया।
पीने की तो आदत ना थी, मुखमुर फिर भी साथ में थे।
मैख़ाना जब से छूटा है, जीना पूरा भूल गया।
हँसना पूरा भूल गया।


Tuesday, August 30, 2016

इक और सुनिये

इतना ग़ुम हूँ कुछ यादों में यादें याद नहीं रहतीं,
रोने के बाद भी देखो चीखें फरियाद नहीं बनतीं।
सुनाऊँ किसको मैं ये दर्द सभी आँसू में भीगे हैं,
हमारी चुप्पियाँ भी तो कोई बुनियाद नहीं बनतीं।


Friday, August 05, 2016

ऐसे ही एक और

ना कह के भी कुछ यूँ कह दिया,
जान कर भी वो गलत समझा ऐसा कहा।
बोल देते तो फिर कुछ क्या होता,
सुन कर भी जिसने अनसुना किया?