Wednesday, December 03, 2014

इस बार एक कविता

कोई क्लेष नही, सब त्याग किसी वन को जाने में।
कोई क्लेष नहीं, अपने को वानर कहलाने में।
कोई क्लेष नहीं, गर अग्नि परीक्षा हो मेरी,
कोई क्लेष नही मुझको, धरती में समाने में।
पर ये तो बता मुझको प्यारे -
क्या योग्य तू है, इक राम कहलाने में?

Friday, November 28, 2014

Dr Kumar Vishwas ke ek sher ka mera jawab

डॉ कुमार विश्वास ने ट्वीट पर ये शायरी लिखी -
शोहरतें जिनकी वजह से दोस्त दुश्मन हो गए,
सभी यहीं रह जाएंगी मैं साथ क्या ले जाऊंगा?

मेरा जवाब भी सुन लें -
साथ कुछ न जायेगा, शोहरत रहे या न रहे।
कम से कम रहने से उसके इक छाप तो रह जाएगी।


Thursday, November 13, 2014

लीजिये इक और शेर

चाँद को घर पे सजा देंगे इक़रार था जिनका,
ज़मीं से बस अब्र दिखा देना चुभे है जैसे नश्तर।
हम तो अंधेरों के एक बाशिंदे थे,
खुश हो जाते ग़र दिखा देते इक चमकता अख़्तर॥


Monday, November 10, 2014

एक और सुनो

कुछ ख़ास अब ये ग़म नहीं,
दुश्मन हमारे बढ़ गए।
इस बात की है फ़िक्र बस,
कुछ दोस्त क्यों गर कम हुए?

Wednesday, September 03, 2014

Another my extenstion to Kumar Vishwas's poem

 कुमार विश्वास ने ट्वीट किया:
जो बसेरा है अपनी रातों का ,सब उसे आसमान कहते हैं. 
 छत पे बारिश ने रात काटी है ,गीले-गीले निशान कहते हैं. 
मैंने कुछ और बढ़ा दिया:
जिधर देखो उधर बस अहबाब की भीड़ है,
तो अकेलापन केवल हम क्यों सहते हैं?

Thursday, August 21, 2014

Atal aapko Naman (अटल आपको नमन)

बोलने भर से कोई शाषक नहीं होता, 
काम खुद में ही इक वाचक नहीं होता।
बादल तो हर बार निकलते हैं,

भीगने भर से कोई चातक नहीं होता॥


Wednesday, April 30, 2014