तुम्हे अल्लाह की हमें भगवान की फिक्र होती है,
फ़िज़ूल की बातों की सरेआम फिक्र होती है
तुम मस्जिदों में हम मंदिरों में किताबें पढ़ लें अलग,
नफरतों से टूट रहे इंसानों की फिक्र होती है।
दरिंदे भेज कर बेगुनाहो का क़त्ल करते हो,
कोख से पैदा हुए इंसानो का फ़र्क़ करते हो,
झूठ की ईमारत खड़ी होती है,
नफरतों से टूट रहे इंसानों की फिक्र होती है।
कहाँ है जन्नत जो दरिंदों को हूर देते हो,
कौन सी मुक्ति जो बहुओं को फूँक देते हो,
ये कौन सी दुनिया है जो बनाये बैठे हो?
एक मालिक की दो तस्वीर कभी होती है?
नफरतों से टूट रहे इंसान की फिक्र होती है।
Monday, November 02, 2026
एक और सुनो
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