Tuesday, November 03, 2020

एक और सुनो

मेरी याद आये तो क़िताबों को चूम लेना,

पन्नो पर न सही, उनके बीच रहा करते थे!

कभी फूल, पत्ती, कभी कलम की निशानों पर,

मेरी तस्वीर न सही, तेरी यादों में बसा करते थे!!!


Wednesday, July 22, 2020

एक और सुनो

इक ज़मीन,
कुछ फ़लों के पेड़,
कुछ क्यारियाँ, एक दो किलकारियाँ
कुछ कमरे, इक छत
पानी न ठहरने वाली फ़र्श
कुछ हाथ हमेशा साथ
एक मुस्कुराहट
क्या इतना महंगा था ये ख्वाब?


Friday, January 24, 2020

एक शेर लखनवी पर

ऐसा नहीं है सब लखनवी शायर ही होते हैं,
मिजाज़ बस ऐसा है जो शायराना लगता है |
मिलोगे उनको, तुम्हे लगेंगे बस अपने ही जैसे,
बस तल्लफ़ुज़ कुछ ऐसा है, याराना सा लगता है | 


एक और शेर

ज़िन्दगी उधार की नहीं है, जिसे जी रहा हूँ मैं
बस इधर उधर की बात है, जिसे पी रहा हूँ मैं

एक शेर लखनऊ पर

यूँ रह गयी है शहर-ए-अदब लखनऊ अब मेरी,
शहर-ए-सुखं छिपा है ताख़ पर, बस दबदबा चल रहा|