Wednesday, July 03, 2019

एक और सुनो

कमज़ोर होती आँखों में कुछ दुनिया की धूल है,
कुछ नैतिकता की चमक कुछ आँसू, कुछ भूल है
दिखाई दे न दे क्या आगे है मेरे,
मुझे मालूम है मगर पास क्या है मेरे, क्या दूर है

Thursday, May 23, 2019

सुनो

अपने ही मुझको भूल गए, क्या गिला किससे?
हमारे दिन भी अकेले हैं, और ख्याली किस्से||

Thursday, January 31, 2019

क्या लिखूं?


खुद को क्यूँ पहचाना लगता हूँ,
मर तो कब का चुका, क्यूँ चलता रहता हूँ?

Saturday, November 03, 2018

दूर कहीं क्यों जाते हो?

तुम सर्वशक्ति तुम सार्वभौम,
तुम प्राण हृदय, तुम सब कुछ हो
तुम नारायण तुम भोले हो
तुम माँ दुर्गा तुम कण कण हो
पर कहाँ चले जाते हो तुम
जब सबसे अशक्त होते हम हैं
जब मृत्यु निकट होती अपनों की,
तुम विचरण को क्यूँ जाते हो?

गला गला कर व्रत रक्खा है
तुमको पूजा सहज भाव से,
तब छोड़ा जब अधर में हम हों
फिर ईश्वर क्या कहलाते हो?
दूर कहीं क्यों जाते हो?

 जिज्जी तुम बहुत याद आती हो बेटा 

Wednesday, June 20, 2018

हम तो केवल बंजारे हैं

कहने को हम बंजारे हैं,
फिर भी ठौर बदलना दुःख होता है -
फिर फिर कर ही राह बनायी,
मुड़ कर फिर भी दुःख होता है |
चलते रहने वालों का तो जहाँ थमे वो घर होता है -
छूटा हाथ चला जो संग में, छोड़ कर उसको दुःख होता है |
हम तो केवल बंजारे हैं, जहाँ थमे वो घर होता है |

Monday, April 30, 2018

एक और

हम ही छत हैं खम्भे भी, पर-
फर्श हमारी तुम ही हो|
जुड़ते पिटते खड़ा हुआ हूँ, पर-
हर्ष हमारी तुम ही हो ||

एक और सुनो

हमने पानी में लहर बनाई पर पत्थर भी फेंका है,
जलती लकड़ी में भी आखिर अपने ठण्ड को सेका है,
कुछ पाने को थोड़ा थोड़ा बहुत बड़ा कुछ छोड़ा है,
मेरी छाया मुझसे लम्बी, अपनी आँखों का धोखा है|