अपने बराबर पतंगों से नज़र मिलाता हुआ,
ऊंचे पतंगों को निहारता हुआ,
नीचे पतंगों से इतराता हुआ,
कटी पतंग सा लहराता हुआ,
ना देखा तो वो ज़मीन, दसियों लंगड़,
और दूर वो इंसान जिसके हाथों से छूट चुका था मैं|
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अपने बराबर पतंगों से नज़र मिलाता हुआ,
ऊंचे पतंगों को निहारता हुआ,
नीचे पतंगों से इतराता हुआ,
कटी पतंग सा लहराता हुआ,
ना देखा तो वो ज़मीन, दसियों लंगड़,
और दूर वो इंसान जिसके हाथों से छूट चुका था मैं|
कभी लात कभी हवालात बदल देते हैं,
मेरी चाल मेरे हालात बदल देते हैं।
मैं खुद को मुझमें ढूढंता रहता हूँ,
जवाब न मिले तो सवालात बदल लेते हैं।
आवारा सी ज़िन्दगी, इस यायावर को नसीब है
दोस्त बहुत दूर हैं, दोस्ती क़रीब है |
कभी यहाँ कभी वहां भटकी सी लगती है,
मिली भी इक सही, पर ज़िन्दगी अजीब है |
न अपने संग हैं, न पराये दूर कहीं,
बस्ती बहुत दूर है, लगती सजीव है |
हर वक़्त पैमाइश है मेरे नज़रिये की,
लंगड़ों की दौड़ है, अंधे वज़ीर हैं |
शहरों में अक्सर घर बेच कर मकान लिया करते हैं,
कुत्ते बिल्लियों में इंसान लिया करते हैं।
रिश्ते तो बस अब हंसने पीने की ख्वाहिश है,
खंजर तो अब तोहफों में दिया करते हैं।
हम वहीँ हैं, बस दुनिया बदली सी लगती है,
आखिर चश्मे भी तो दुकानों से लिया करते हैं?
पुरानी दोस्ती की एक नई फोटो अक्सर
नई फोटो में कुछ पुराने लोग
नए संग में कुछ पुरानी यादें
पुरानी यादों से निकले कुछ नए ख्वाब
ख्वाबों की ताबीर को कुछ नए कदम
नए कदम, पर वही पुरानी सड़क
पुरानी सड़क में कुछ नए मील के पत्थर
खुदा के नाम पर हमें लूटते रहे
ज़र्रे ज़र्रे में था, हम बस ढूंढते रहे
बिछायी ज़िन्दगी यूँ कि हम फैलते दिखें,
सिमट से रह गए हैं वक़्त, हम बस रूठते रहे
हज़ारों बार निकले हैं इसी गंज से, ऐशबाग़ से
चौक दूजा घर ही था, स्कूल, क़ैसरबाग़ से
बाग़ आलम से निकल जाते थे अमीनाबाद को
जब किताबों के लिए, रुके कुल्फी प्रकाश को
तहज़ीब क्या है ये पता शायद पढ़ाया था नहीं
झुक के मिलते ज़रूर थे, अजनबी पहले आप से
लखनवी क्या हम हैं? मालूम आजतक मुझको नहीं,
शर्मा या टुंडे है, सुना देखा पर रुक के खाया नहीं
लखनऊ बाज़ार है ऐसा कभी सोचा न था, पर यूँ कहूँ -
है दर्द जब जब हुआ इस शहर-ए-सुखं को जब कभी,
महसूस रग रग में हुआ है, इक दिल-इ-बर्बाद से