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Thursday, May 19, 2022

एक और सुनो


खुदा के नाम पर हमें लूटते रहे
ज़र्रे ज़र्रे में था, हम बस ढूंढते रहे 

बिछायी ज़िन्दगी यूँ कि हम फैलते दिखें,
सिमट से रह गए हैं वक़्त, हम बस रूठते रहे

 

Friday, November 01, 2019

एक सुनो दिल्ली के धुएँ पर


किस कम्बख्त ने धुऐं को बुरा कहा?
दिल सुलगता है, फेफड़े जलते हैं, तब कहीं उठता है|
इन गाड़ियों खेतों पर मत जाना,
इंसानी फितरत है, चाह जीने की, पर खुद ही मिटता है|

Thursday, November 30, 2017

इक और सुन लो

हर राह पर मिलते हैं मुझसे जलने वाले,
इसी तपिश से निखर के आना है,
बहुत हैं आस पास अपने, खंज़र लिए हुए,
इक दौर है शायद, गुज़र के जाना है ||


Monday, May 29, 2017

एक और शेर

किसे पूछूँ कहाँ हूँ मैं, सभी भूले से लगते हैं,
मुझे अक्सर परायापन किसी अपने से मिलते हैं|
खड़ा ये सोचता हूँ क्या निकालूँ राह मैं अपनी,
ये पत्थर मील के न बनकर, हमारे सर बरसते हैं||




Friday, November 28, 2014

Dr Kumar Vishwas ke ek sher ka mera jawab

डॉ कुमार विश्वास ने ट्वीट पर ये शायरी लिखी -
शोहरतें जिनकी वजह से दोस्त दुश्मन हो गए,
सभी यहीं रह जाएंगी मैं साथ क्या ले जाऊंगा?

मेरा जवाब भी सुन लें -
साथ कुछ न जायेगा, शोहरत रहे या न रहे।
कम से कम रहने से उसके इक छाप तो रह जाएगी।


Monday, March 03, 2014

Kumar Vishwas ke sher par mera addon

कुमार विश्वास ने एक शेर ट्वीट किया: 
बहुत भले हैं मगर मुश्किलों में रहते हैं,
हमारे ख्वाब भी बिल्कुल हमारे जैसे हैं। 

मैंने दो लाइन्स और add कर दी हैं:
बदल सकते तो बदल लेते अपने ख्वाब किसी और से,
क्या करें उस ख्वाब को सच्चाई बना बैठे हैं ।

Wednesday, October 17, 2012

अहा, शायरी सुनिए

शायर अकील नोमानी ने लिखा है: 
पायेदारी क्या कि बस इक ही लहर से गिर गए ,
कुछ मकाँ सैलाब की झूँठी खबर से गिर गए।


अब मैंने कुछ और बढ़ाया:
सुकूत के बल पे मेरे ऐवान में तुम थे मकीं,
अल्फ़ाज़ तेरी सुन के अब मेरी नज़र से गिर गए।