कभी लात कभी हवालात बदल देते हैं,
मेरी चाल मेरे हालात बदल देते हैं।
मैं खुद को मुझमें ढूढंता रहता हूँ,
जवाब न मिले तो सवालात बदल लेते हैं।
Disclaimer: Thoughts expressed are mine and my only. Why would it be anybody's else? Anyone using the blogs without citing my name is liable for legal action. इस ब्लॉग में सभी पोस्ट्स मेरी स्वयं की रचनाएँ हैं जो कोम्मोंस कॉपीराईट द्वारा सुरक्षित हैं। जो उद्धहरण दूसरों से लिए गए हैं वह या तो कोटेड हैं या उनके मूल रचनाकारों या प्रोडक्ट्स के नाम उद्धत हैं।
कभी लात कभी हवालात बदल देते हैं,
मेरी चाल मेरे हालात बदल देते हैं।
मैं खुद को मुझमें ढूढंता रहता हूँ,
जवाब न मिले तो सवालात बदल लेते हैं।
There was a time when people got together, built a village, created rules and lived by it. Then rules were standardized, applied to villages under a common influence. The common rules made moving easier. Slowly, enforcing rules by one entity became costly, created conflicts. Democracy was then introduced, where rules were agreed upon. Then came the time and will continue to come, when conducting elections becomes costly and the practiced rules will become natural laws.
There was a time when companies built their own hardware and built software for it. Then standardization came and software became independent. Slowly the concept of virtualization sets in and without one, running software became costly. The virtualization evolved into Server-less computing. And then the time of Artificial Intelligence has come when building software has become costly and the information will be left to you to decipher into knowledge, it will be done by AI systems naturally.
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Ashish
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10:19 AM
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आवारा सी ज़िन्दगी, इस यायावर को नसीब है
दोस्त बहुत दूर हैं, दोस्ती क़रीब है |
कभी यहाँ कभी वहां भटकी सी लगती है,
मिली भी इक सही, पर ज़िन्दगी अजीब है |
न अपने संग हैं, न पराये दूर कहीं,
बस्ती बहुत दूर है, लगती सजीव है |
हर वक़्त पैमाइश है मेरे नज़रिये की,
लंगड़ों की दौड़ है, अंधे वज़ीर हैं |
शहरों में अक्सर घर बेच कर मकान लिया करते हैं,
कुत्ते बिल्लियों में इंसान लिया करते हैं।
रिश्ते तो बस अब हंसने पीने की ख्वाहिश है,
खंजर तो अब तोहफों में दिया करते हैं।
हम वहीँ हैं, बस दुनिया बदली सी लगती है,
आखिर चश्मे भी तो दुकानों से लिया करते हैं?
सब रोते हैं तुम्हारे जाने के बाद
छुप छुप कर, मैं भी
फूट ना पड़ें, इसलिए बात नहीं करते
पापा भी रोते थे, छुप छुप कर
कभी सामने नहीं
अब पापा भी नहीं हैं
मिली होगी ना?
क्या कहते हो एक दुसरे से?
गुस्सा करती हो? अभी भी?
मुझ पर क्यों नहीं किया?
मतलबी क्यों नहीं थी तुम?
मेरी तरह, छुप छुप कर?
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Ashish
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8:21 PM
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दो बेटे थे, पिता की दुकान थी, बाजार में अच्छी चलती थी, सभी इर्षा करते
थे| बेटों की शादियां हुईं, उनके बच्चे भी बड़े होने लगे| बहुएँ बाकी
दुकानदारो के परिवार के साथ उठने बैठने लगीं| पिता की तबियत ख़राब रहने लगी|
कभी बच्चों की पढ़ाई कभी तबियत की वजह से बेटे दुकान में ना बैठ पाते थे|
आपस में झिकझिक होने लगी| घूमने के लिए रक्खा पैसा घर के कामों के लिए लगने
लगा| बहुएँ कुछ अपने को छोटा महसूस करने लगीं, पार्टियों से दूरी रहने लग
गयीं. बाकी दुकानदारों के परिवार का घर में आना जाना बढ़ गया| कुछ केवल छोटी
बहु से मिलतीं तो कुछ बड़ी बहु से| चाय नाश्ता भी अलग बनने लगा| अब रात का
खाना भी लोग अलग अलग समय करने लगे, अक्सर अपने कमरे में ही| सोशल प्रेशर
की वजह से दुकान अलग अलग कर दिया| भाई भाई अलग हो गए| दोनों परिवार अब अपने
पिता से अमीर थे पर उनकी बाज़ार में साख चली गयी|
Motto of the story is - अपनी छोटी परेशानियों में अगर बाहर वाले इन्वॉल्व होंगे तो केवल घर ही टूटेगा|
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Ashish
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10:37 AM
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पुरानी दोस्ती की एक नई फोटो अक्सर
नई फोटो में कुछ पुराने लोग
नए संग में कुछ पुरानी यादें
पुरानी यादों से निकले कुछ नए ख्वाब
ख्वाबों की ताबीर को कुछ नए कदम
नए कदम, पर वही पुरानी सड़क
पुरानी सड़क में कुछ नए मील के पत्थर
बरसाती पानी से हैं कुछ, फूली फूली दीवारेँ
खिड़की कम हैं परदे ज्यादा, बिछी हुई हैं अख़बारें
पथरीली आँखों के पीछे छिपे हुए हैं सपनो सी,
शब्दकोष में बिछड़ गए हैं उम्मीदों की बौछारें |
कहना जो है मालूम सबको, जो बैठे जो सुनते हैं
वो ना पूछें, जो सोचा है, खिंची आँखों की तलवारें
ये घर है, है वही पुराना, समय है केवल बदला सा,
अपने अपने व्यूह में फँस कर अभिमन्यु है थक हारे|
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Ashish
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10:59 PM
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एक मनुष्य था उसकी आँखें थीं
कुछ सपने थे कुछ साहस था
कुछ कदम थे उसको चलने,
कभी धुप रही कभी पावस था|
जीवन भट्टी में झोंक दिया,
तप कर, निखर के आने को
सोना था या पानी भाप बना,
कुछ करने का दुस्साहस था|
कुछ लोग मिले कुछ बिछड़े भी,
कोई संग चला, कोई नाविक था
अपना अपना एक स्वर्ग बना
दोनों बाहों में भरता था|
जब आँख खुली तो सपने थे
कुछ टूटे, कुछ अँगारों में,
पर अब भी देख सकता था वो,
उस अंतर्मन की आँखें थीं,
वो मनुष्य था उसकी आँखें थी|
Posted by
Ashish
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5:01 PM
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खुदा के नाम पर हमें लूटते रहे
ज़र्रे ज़र्रे में था, हम बस ढूंढते रहे
बिछायी ज़िन्दगी यूँ कि हम फैलते दिखें,
सिमट से रह गए हैं वक़्त, हम बस रूठते रहे
दो लोग अपने प्यारे घोड़े पर बैठ कर अपने गॉव जा रहे थे, तभी उनको एक नदी दिखाई दी| नदी में पानी का बहाव तेज़ था और जाना उस पार था, बाढ़ की वजह से पानी भी चढ़ा हुआ था| दोनों को एक छोटी सी नाव दिखाई दी, वहीँ दो बड़े बड़े पतवार भी थे| उन्होंने विमर्श किया, छोटी नाव में घोड़ा नहीं आ पाएगा पर वो दोनों बैठ जायेंगे, क्योंकि घोड़े को तैरना आता है, पर बहाव की वजह से कहीं बह ना जाए इसलिए उसकी लगाम नाव में बाँध देंगे।
नदी के मगरमच्छ ने देख लिया घोड़े को उतरते हुए, पर पतवार देख कर पास आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया| उसने जुगत लगाया - देखो दोनों इंसानो को, कितना बुरा व्यवहार मेरे जैसे जानवरों पर करते हैं, बेचारे घोड़े को बाँध कर पानी के बहाव के विपरीत दिशा में खींच के ले जा रहे हैं| अगर लगाम हटा दें तो घोड़ा अपने आप ही पानी के सहारे जल्दी से किनारे पर आ जायेगा, ये इंसान बस केवल अपने गांव जाना चाहते हैं, चाहे घोड़े को कितना ही कष्ट हो जाए|
घोड़ा सोच में पड़ गया, बात तो मगरमच्छ ने सही कही है, लगाम की वजह से मैं आज़ादी के साथ तैर नहीं पा रहा हूँ| तभी एक छोटी मछली ने घोड़े से कहा - इस मगरमच्छ ने इस नदी की सारी मछलियों को खा लिया है, मैं भी सोचती हूँ, मगर के साथ एक नदी से तो अच्छा था लगाम के साथ इंसानो के साथ रहती| तभी एक भीगा भीगा तोता घोड़े के पीठ पर आ कर बैठ गया - अरे मैं अभी इंसानो की क़ैद से छूट कर आया हूँ, अब तो मेरी हालत ये है की मैं कायदे से उड़ भी नहीं पा रहा हूँ, काश मैं मछली होता तो कम से कम मुझे पानी से डर तो न लगता
,मगरमच्छ घोड़े के साथ उसको परामर्श देने वाले दो और जानवरो को देख कर पीछा करना छोड़ दिया और दूर चला गया, उसको दूर जाता देख, मछली जल्दी से अपने खोह में चली गयी, और तोते ने इंसानो को इतने पास देख कर उड़ कर पेड़ में बैठ गया| तब तक किनारा भी आ चुका था|
Posted by
Ashish
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1:07 PM
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कुछ बूढ़े हो चले पर, हम में भी कभी चार्म था
मोस्ट्ली केयरिंग थे, पर कुछ कुछ कभी हार्म था
हैफ़ेज़ार्ड सी ज़िन्दगी थी, फिर भी एक नॉर्म था
घर अपना था फिर भी लगता एक डोर्म था
दोस्तों के बियर के संग चाय मेरा वार्म था
सोते अपने मर्ज़ी से थे पर जगाता अलार्म था
अब मुस्कुराते हैं, कैसे थे कैसे हो चले हैं,
रोल छोटे छोटे सही, पर बड़ा बड़ा काम था